पुलिस मामला दर्ज करने के बाद भी राजनीतिक संरक्षण के आरोपों के बीच अपराधियों पर मेहरबान क्यों?
जालंधर (नीरज जिंदल) जालंधर सेंट्रल क्षेत्र में नशा तस्करी, गैंगस्टर गतिविधियों, मारपीट, धमकियों और आपराधिक घटनाओं को लेकर लगातार गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
जालंधर सेंट्रल के लोगों में चर्चा है कि कुछ आपराधिक तत्वों के खिलाफ पुलिस थानों में मामले तो दर्ज हो जाते हैं, लेकिन इसके बाद प्रभावी कार्रवाई, गिरफ्तारी और अपराधियों के नेटवर्क को तोड़ने की प्रक्रिया कई मामलों में अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ती। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या अपराधियों को किसी प्रकार का राजनीतिक या अन्य प्रभावशाली संरक्षण प्राप्त है, अथवा पुलिस कार्रवाई में किसी स्तर पर ढिलाई बरती जा रही है?
पिछले कुछ समय में जालंधर सेंट्रल के अलग-अलग इलाकों से नशा बिक्री, अवैध हथियार, गैंगवार, फिरौती, धमकियां और मारपीट से जुड़े मामलों की चर्चाएं सामने आती रही हैं। पुलिस द्वारा कई मामलों में स्वय और कई मामलों में माननीय कोर्ट के आदेश पर एफआईआर दर्ज किए जाने और आरोपियों की पहचान होने के बावजूद यदि आरोपी लंबे समय तक खुले घूमते रहें तो आम जनता के मन में पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।
कानून व्यवस्था का मूल उद्देश्य केवल मामला दर्ज करना नहीं, बल्कि आरोपी की गिरफ्तारी, निष्पक्ष जांच, साक्ष्य जुटाना, अदालत में मजबूत चालान पेश करना और अपराध के पूरे नेटवर्क को समाप्त करना भी है। यदि किसी गंभीर मामले में एफआईआर दर्ज होने के बाद आगे की कार्रवाई धीमी पड़ जाती है, तो इससे न केवल पीड़ित पक्ष का विश्वास कमजोर होता है बल्कि अपराधियों के हौसले भी बढ़ सकते हैं।
जालंधर सेंट्रल के नागरिकों का कहना है कि पुलिस को यह स्पष्ट करना चाहिए कि गंभीर आपराधिक मामलों में कितने आरोपी अभी तक गिरफ्तार हुए, कितने फरार हैं, कितनों को भगोड़ा घोषित करने की प्रक्रिया शुरू की गई और कितने मामलों में चार्जशीट अदालत में दाखिल की गई है।
पुलिस प्रशासन यदि इन आंकड़ों को सार्वजनिक करता है तो इससे जनता के बीच पारदर्शिता और विश्वास दोनों बढ़ेंगे।
सबसे चिंताजनक स्थिति तब बनती है जब किसी अपराधी या संदिग्ध व्यक्ति की राजनीतिक नेताओं अथवा प्रभावशाली व्यक्तियों के साथ तस्वीरें सामने आती हैं और उसके बाद पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठने लगते हैं।
केवल किसी नेता के साथ तस्वीर होना अपराध सिद्ध नहीं करता, लेकिन यदि किसी आरोपी को वास्तविक रूप से संरक्षण दिया जा रहा हो या पुलिस कार्रवाई प्रभावित की जा रही हो, तो यह कानून के शासन के लिए बेहद गंभीर विषय है। ऐसे मामलों की निष्पक्ष जांच आवश्यक है।
नशे के कारोबार का प्रभाव केवल एक व्यक्ति या परिवार तक सीमित नहीं रहता। इसका सीधा असर युवाओं, परिवारों, रोजगार, कानून व्यवस्था और समाज की सुरक्षा पर पड़ता है। यदि किसी क्षेत्र में नशा बेचने वाले तत्व सक्रिय हैं और उनके खिलाफ समय रहते कार्रवाई नहीं होती, तो धीरे-धीरे वही नेटवर्क गैंगस्टर गतिविधियों, अवैध हथियारों, फिरौती और हिंसक अपराधों से भी जुड़ सकता है।
पंजाब सरकार और पुलिस प्रशासन लगातार नशे तथा संगठित अपराध के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति की बात करते रहे हैं। ऐसे में जालंधर सेंट्रल जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र में यदि अपराध को लेकर लगातार शिकायतें सामने आ रही हैं, तो वरिष्ठ अधिकारियों को स्वयं इसकी समीक्षा करनी चाहिए। पुलिस कमिश्नरेट स्तर पर यह जांच होनी चाहिए कि किन मामलों में गिरफ्तारी लंबित है और उसका कारण क्या है।
यह भी जरूरी है कि किसी थाने या अधिकारी पर बिना प्रमाण आरोप लगाने के बजाय मामलों की तथ्यात्मक समीक्षा की जाए। संबंधित एफआईआर, जांच की स्थिति, आरोपियों के खिलाफ जारी वारंट, कोर्ट की कार्यवाही और पुलिस रिकॉर्ड के आधार पर ही यह तय किया जाना चाहिए कि कार्रवाई में वास्तव में लापरवाही हुई है या नहीं।
यदि किसी आरोपी को राजनीतिक दबाव के चलते बचाने की शिकायत है तो शिकायतकर्ता को वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों, विजिलेंस अथवा सक्षम न्यायिक मंच के समक्ष दस्तावेजों के साथ शिकायत करनी चाहिए।
कानून से ऊपर कोई व्यक्ति नहीं होना चाहिए—चाहे वह कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो।
जालंधर सेंट्रल की जनता पुलिस प्रशासन से यह उम्मीद करती है कि नशा बेचने वालों, गैंगस्टरों, अवैध हथियार रखने वालों, फिरौती मांगने वालों और लोगों को धमकाने वाले अपराधियों के खिलाफ बिना किसी भेदभाव के सख्त कार्रवाई की जाए। पुलिस को केवल छोटे स्तर के आरोपियों तक सीमित रहने के बजाय उनके पीछे काम कर रहे पूरे नेटवर्क, फंडिंग, सप्लायर और संरक्षण देने वालों तक पहुंचना होगा।
सवाल यह भी है कि किसी आरोपी के खिलाफ कई आपराधिक मामले दर्ज होने के बावजूद उसकी गतिविधियों पर लगातार नजर क्यों नहीं रखी जाती। आदतन अपराधियों और गैंग से जुड़े संदिग्ध व्यक्तियों की निगरानी, हिस्ट्रीशीट, समय-समय पर सत्यापन और अदालत में प्रभावी पैरवी जैसे कदम बेहद जरूरी हैं।
कानून व्यवस्था तभी मजबूत मानी जाएगी जब आम नागरिक बिना डर के शिकायत दर्ज करा सके और उसे यह भरोसा हो कि उसकी शिकायत के बाद आरोपी के प्रभाव या राजनीतिक पहुंच के आधार पर जांच प्रभावित नहीं होगी।
जालंधर पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों को जालंधर सेंट्रल के संवेदनशील क्षेत्रों में विशेष अभियान चलाकर नशा तस्करों और गैंगस्टर नेटवर्क पर कार्रवाई करनी चाहिए।
संदिग्ध ठिकानों की जांच, फरार आरोपियों की गिरफ्तारी, अवैध हथियारों की बरामदगी और नशे की सप्लाई चेन तोड़ने के लिए विशेष टीमों का गठन भी प्रभावी कदम हो सकता है।
जनता का पुलिस से एक ही सवाल है—अगर नामवर अपराधी, गैंगस्टर एक्ट में शामिल, गोलियां मारने की धमकियां देने वाले, हत्या के प्रयास के आरोपी तथा गैंग चलाने वाले एफआईआर दर्ज होने के बावजूद अगर ऐसे नामवर अपराधी खुले घूम रहे हैं, तो उन्हें गिरफ्तार करने में देरी क्यों?
यदि किसी प्रकार का राजनीतिक दबाव नहीं है तो लंबित मामलों की स्थिति सार्वजनिक क्यों नहीं की जाती?
नशे और गैंगस्टरवाद के खिलाफ लड़ाई केवल पुलिस की नहीं बल्कि पूरे समाज की लड़ाई है। लेकिन इसकी पहली जिम्मेदारी कानून लागू करने वाली पंजाब और केन्द्र की एजेंसियों की है। अपराधी चाहे किसी भी राजनीतिक दल, संगठन या प्रभावशाली व्यक्ति के संपर्क में क्यों न हो, कार्रवाई केवल कानून के अनुसार होनी चाहिए।
उजाला केसरी का उद्देश्य किसी व्यक्ति को बिना जांच दोषी ठहराना नहीं, बल्कि कानून व्यवस्था से जुड़े उन सवालों को जनता और प्रशासन के सामने रखना है जिनका स्पष्ट जवाब मिलना जरूरी है। आरोपों की वास्तविकता जांच का विषय है और संबंधित पक्षों का पक्ष भी समान रूप से महत्वपूर्ण है।
अब देखना होगा कि जालंधर पुलिस प्रशासन इन सवालों का जवाब केवल बयानों से देता है या फिर नशा तस्करों, गैंगस्टर गतिविधियों में शामिल अपराधियों व गोली मारने की धमकियां देने वाले तथा कोर्ट के आदेश पर दर्ज हुए मामलों और फरार अपराधियों के खिलाफ जमीन पर बड़ी कार्रवाई करके जनता का विश्वास मजबूत करता है।